
आज सुबह मैं सोकर उठने ही वाला था, कि आँखें खुलने से पहले, एक अजनबी परछाईं मुझे मेरे सामने खड़ी मिली. उस अजनबी को अचानक अपने पास यूँ खड़ा पाकर मैं एक पल के लिए डर गया,पर उसके शान्त चेहरे पर खिली मधुर मुस्कान यह जता रही थी कि अनजानी सी दिखने वाली वह परछाईं मेरा हरगिज़ बुरा नहीं चाहती. मैं उससे उसके बारे में कुछ पूछ पाता, इससे पहले ही, अपना परिचय देते हुए वह खुद बोल पड़ी - "लगता है तुम मुझे नहीं पहचानते. तुम क्या, आज धरती पर रहने वाला कोई भी इन्सान मुझे नहीं पहचान पाता.मैं वह हूँ , जिसने द्वापर युग में गोपियों को भगवान के दर्शन कराये थे. वह मैं ही था, जिसने इस सृष्टि का निर्माण करने में ईश्वर की मदद की थी और मेरे ही कारण आज तुमसब जन्म ले सके हो. मेरा नाम है - "प्यार", जिसका वजूद अब धीरे-धीरे दुनियाँ से समाप्त होता जा रहा है. स्वार्थ,वासना और रंजिश - ये तीन नाम, मेरे उन दुश्मनों के हैं, जो हर हाल में मुझे इन्सानों के दिलों से मिटा देने के लिए तुल चुके हैं. यही वजह है कि उनकी मार से बचने के लिए, मैं आज-कल पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों के दिलों तक ही सिमटकर रह गया हूँ. मगर, अब मुझसे मेरे अधिकारों का हनन सहन नहीं हो पाता. मैं अन्य सभी जीव-जन्तुओं के साथ-साथ, धरती पर रह रहे प्रत्येक इन्सानों के दिलों में भी पनाह पाना चाहता हूँ. हो सके तो मुझे बचा लो. क्योंकि, जिस जतन से मैंने और ईश्वर ने मिलकर इस सृष्टि का निर्माण किया है, हज़ार नहीं, लाख नहीं, करोड़ों वर्ष लग जायेंगे, दुबारा उस स्थिति को हासिल करने में, अगर स्वार्थ, वासना और रंजिश के हाथों मैं मारा जाता हूँ. क्योंकि, यह अटल सत्य है कि जिसदिन मैं न रहा, निश्चित है, उसी दिन से प्रलय आरम्भ हो जाएगा. जिसके बाद, कोई नहीं रोक सकता, इस धरती को मिटने से.