[जन्म के साथ ही आरम्भ हो जाती है,श्वासों के पतन की कहानी,जिसके बाद प्राणी के पग मंद गति से मृत्यु की ओर बढ़ चलते हैं.किन्तु,इस अटल-सत्य से लापरवाह मनुष्य काम-क्रोध-मद-लोभ-मोह के घेरे में घिरकर अपने अमूल्य श्वासों का तबतक दुरूपयोग करता रहता है,जबतक उसे साक्षात् मृत्यु-देवता के दर्शन नहीं हो जाते.जीवन के अन्तिम क्षणों में आकर कर्मों के खाते जब खुलते हैं,तो अपने हिस्से में शून्य देख सिवा पछतावे के और कुछ शेष नहीं रह जाता.वह विक्षिप्त हो उठता है यह सोचकर कि मैंने अपना सारा जीवन अनायास ही व्यर्थ के प्रपंचों और उस आनंद के अधीन कर डाला,जो मुझे वास्तविक सुख व् सौभाग्य से विमुख कर गये.ईश्वर ने मुझे इतना बड़ा अवसर दिया था जीवन को सफल बनाने का,पर मैंने अज्ञानतावश उन सभी अवसरों को खो दिये.अब मैं क्या करूँ ? वह कौन सा उपाय ढूँढूँ कि मेरे समस्त पाप धुल जाएँ और मुझे मुक्ति मिल सके ?ऐसे में, स्वयं अपने भीतर से एक आवाज़ सी निकलती है...........]
अब क्या रोता है जब तेरा,अंत समय आया है !
सोच ज़रा क्या मिल सकता था,और क्या मिल पाया है !!
अपने आप को जीवन भर,तू खुद ठगता आया है,
सोच ज़रा क्या मिल सकता था और क्या मिल पाया है !!
यम के चाबुक से कोई भी,कभी नहीं बच पाता,
कैसे भूल गया तू ये सच,राम ही काम है आता ?
स्नेह-नेह के बन्धन में कुछ,किसने कब पाया है !
सोच ज़रा क्या मिल सकता था और क्या मिल पाया है !!
जीवन भर अभिमान के वश में,अपनी गाथा गायी.
दान-धर्म से विमुख सदा होकर मन की करवायी,
ईश्वर को अब दोष न दे,दोषी तेरा साया है,
सोच ज़रा क्या मिल सकता था और क्या मिल पाया है !!
निज-सौभाग्य की इच्छा में,कितनों के हृदय दु:खाए,
रोगी-दीन-दु :खी-वृद्धों की ओर,न देख भी पाए.
कर्मों के परिणाम के चलते,भाग्य पतन पाया है.
सोच ज़रा क्या मिल सकता था और क्या मिल पाया है !!
निर्धन जिसको मान के तूने,द्वार के बाहर रोका,
पुण्य-तुला पर अर्जित-धन, तुझसे ज़्यादा है उसका.
अर्थ के सच्चे अर्थ का परिचय,अब जाकर पाया है.
सोच ज़रा क्या मिल सकता था और क्या मिल पाया है !!
अब भी समय है जप ले बन्दे,उल्टा नाम ही रब का.
तर जायेगा भव-बन्धन से,मिटा दे शोक व् शंका.
चमत्कार फिर देख राम का,त्याग जिसे आया है.
सोच ज़रा क्या मिल सकता था और क्या मिल पाया है !!
*शब्द स्पष्टीकरण : "अर्थ"-१ ( Money -धन ) "अर्थ"-२ ( Meaning -मायने)