[ विश्व में अनेक सुविख्यात राजनीतिक पुरुष हुये हैं और होते रहेंगे, किन्तु महात्मा गाँधी के समान विश्व की संस्कृतियों में झंकार उत्पन्न कर देने वाले महापुरुष यदा-कदा ही मानव-समुदाय को जागृत करने तथा उसे दैवी-प्रकाश का दिव्य-सन्देश प्रदान करने का उद्देश्य लेकर धरती पर आते हैं. विरोधीजन चाहे कुछ भी बोलें या कहें, बापू का महिमामय व्यक्तिव्य हिमालय के समान ऊँचा, सागर के समान गम्भीर और पुण्यतीया पयस्विनी गंगा के समान निर्मल व पावन था. सत्य, अहिंसा, प्रेम, कर्म, साहस, व्यक्तिवाद अथवा सर्वोदय तथा आयुर्वेद या प्राकृतिक चिकित्सा आदि पर आधारित उनका जीवन-दर्शन निश्चय ही अनुकरणीय है. "प्रेम द्वारा हृदय-परिवर्तन किया जा सकता है." - इस पर गाँधीजी का दृढ़-विश्वास था. उनके इस विश्वास का प्रतिबिम्ब उनके सम्पूर्ण जीवन में परिलक्षित होता है.
बापू के मतानुसार व्यक्ति का उद्भव एक दैवीय देन है, अतः उसका उद्देश्य आध्यात्मिक होना चाहिये. इस उद्देश्य की पूर्ति तभी सम्भव है जब व्यक्ति स्वयं को ही साध्य मानकर चले. एक ऐसे समाज की आधारशिला रखे, जहाँ छोटे-बड़े के भेद-भाव से दूर हर प्राणी समान हो. समान सुविधा, समान अवसर, समान अधिकार एवं शक्ति प्रदान करने वाला देश ही विश्व के मानचित्र पर सर्वोपरि उपस्थित हो सकता है, इसी विचार को जनभाषा में "गाँधीवाद" अथवा "सर्वोदय" की संज्ञा प्राप्त है. महात्मा गाँधी ने जाति-वर्ग, धर्म और राजनीति की भेद-भावना से मुक्त रहकर न सिर्फ समस्त प्राचीन व समकालीन परम्पराओं से लाभ उठाया बल्कि, विभिन्न जाति-धर्म और विचारधाराओं से सम्बंध रखने वाले देशवासियों को एक सूत्र, एक कतार में लाने का अद्भुत कार्य सम्भव कर दिखाया.
वास्तव में, ऐसी महान विभूति का जीवन-दर्शन विश्वाकाश में चमकता हुआ ऐसा सूर्य है, जिससे प्रत्येक मानव आशा एवं कर्म-ज्ञान की किरणें प्राप्तकर जीवन को सफल बनाता हुआ शाश्वत-शान्ति में लीन हो सकता है. बापू के व्यक्तिव्य का सबसे बड़ा जादू तो उस समय दिखायी पड़ा, जब बिना युद्ध किये ही अहिंसा के बल पर उन्होंने भारत को स्वतंत्रता दिलायी . इसीलिए न केवल भारत में अपितु संसार के कोने-कोने में उनके दिव्य-गुणों की प्रशंसा की जाती है. बड़े-बड़े राजे-महराजे , अमीर-गरीब, शत्रु-मित्र सभी उनके समक्ष नतमस्तक रहे. आइये हम भी नमन करें उस सच्चे कर्मयोगी को जिसने प्राण देकर भी हमारे लिये सुखद, सुन्दर और स्वतंत्र जीवन का गौरव प्रदान किया है.]
हे राष्ट्रपिता ! तव चरणों में, हम श्रद्धा-सुमन चढ़ाते है.
है बारम्बार प्रणाम तुम्हें, हम कीर्ति तुम्हारी गाते हैं.
परतंत्र हुआ था जब भारत,
और ब्रिटिश हुकूमत चलती थी.
कबतक जीयेंगे दास बने,
यह बात सभी को खलती थी.
तुमने निर्जीव शरीरों में,
फिर से अमृत-संचार किया.
सोयी जनता के मानस में,
आज़ादी का हुंकार किया,
भारत माता के अमर-पुत्र !
हम तुमको शीश नवाते हैं.
है बारम्बार प्रणाम तुम्हें,
हम कीर्ति तुम्हारी गाते हैं.
है सच्चाई में कितना बल,
तुमने प्रत्यक्ष दिखाया था.
तुम चले अहिंसा के पथ पर,
इससे स्वराज्य दिलवाया था.
आदर्श तुम्हारा राम-राज्य,
तुम राम-भक्त कहलाते थे,
इस राजनीति में रहकर भी,
नित राम-नाम-गुण गाते थे.
स्मरण तुम्हारा करते ही,
आँखों में आँसू आते हैं.
है बारम्बार प्रणाम तुम्हें,
हम कीर्ति तुम्हारी गाते हैं.
* गीतकार : गौरीशंकर श्रीवास्तव " दिव्य "